भारतीय वायुसेना (IAF) की घटती लड़ाकू विमानों की संख्या को देखते हुए स्वीडन की दिग्गज डिफेंस कंपनी Saab ने एक बड़ा दांव खेला है। 3 से 8 फरवरी, 2026 के बीच आयोजित सिंगापुर एयरशो सिंगापुर के दौरान कंपनी ने भारत को 'ग्रिपेन E' (Gripen E) फाइटर जेट्स का स्थानीय स्तर पर उत्पादन करने का प्रस्ताव दिया है। यह предложение ऐसे समय में आई है जब भारत अपने बेड़े को आधुनिक बनाने के लिए संघर्ष कर रहा है और महंगे विकल्पों के बीच एक किफायती लेकिन शक्तिशाली विकल्प की तलाश में है।
यहाँ पेंच यह है कि साब (Saab) केवल विमान बेचने की बात नहीं कर रहा, बल्कि वह भारत को एक पूरा एरोस्पेस इकोसिस्टम देने का वादा कर रहा है। कंपनी का कहना है कि वह डिजाइन, उत्पादन और मेंटेनेंस से लेकर टेक्नोलॉजी ट्रांसफर तक सब कुछ भारत में ही करेगी। इसमें भारत की 300 से अधिक कंपनियों, जिनमें छोटे और मध्यम उद्यम (MSMEs) भी शामिल हैं, को जोड़ा जाएगा। यह केवल एक डील नहीं, बल्कि भारत की डिफेंस मैन्युफैक्चरिंग क्षमता को एक नई ऊंचाई पर ले जाने की कोशिश है।
राफेल की तुलना में भारी कीमत लाभ और कम खर्च
जब हम पैसों की बात करते हैं, तो ग्रिपेन E का गणित काफी दिलचस्प है। साब के चीफ मार्केटिंग ऑफिसर Mikael Franzen के मुताबिक, ग्रिपेन E की एक यूनिट की कीमत लगभग 85 मिलियन से 146 मिलियन डॉलर के बीच है। इसकी तुलना में, अगर हम राफेल (Rafale) को देखें, तो हथियारों के पैकेज, ट्रेनिंग और लॉन्ग-टर्म मेंटेनेंस को मिलाकर एक जेट की प्रभावी लागत 300 मिलियन डॉलर को पार कर जाती है। आसान शब्दों में कहें तो, ग्रिपेन E की कीमत राफेल के कुल पैकेज के मुकाबले आधे या उससे भी कम बैठती है। (सोचिए, बजट का कितना बड़ा हिस्सा बच सकता है!)
सिर्फ खरीदने की कीमत ही नहीं, बल्कि उड़ाने का खर्च भी कम है। ग्रिपेन E के संचालन की लागत प्रति उड़ान घंटा लगभग 4,000 से 10,000 डॉलर है, हालांकि कुछ उच्च अनुमान इसे 22,000 डॉलर तक बताते हैं। साब का दावा है कि इसकी हाई अवेलेबिलिटी (High Availability) और आसान रखरखाव इसे युद्ध के समय एक बड़ा एडवांटेज देता है।
- प्रस्तावित कीमत: $85 मिलियन से $146 मिलियन प्रति विमान।
- परिचालन लागत: $4,000 - $10,000 प्रति उड़ान घंटा।
- स्थानीय भागीदारी: 300+ भारतीय कंपनियों और MSMEs का जुड़ाव।
- डिलीवरी समय: कॉन्ट्रैक्ट साइन होने के तीसरे साल से शुरू।
- रणनीतिक स्थिति: राफेल (भारी स्ट्राइक) और तेजस (लाइट फाइटर) के बीच की खाई को भरना।
तकनीकी बढ़त और 'गेम चेंजर' क्षमताएं
ग्रिपेन E को सिर्फ एक किफायती विमान नहीं, बल्कि एक 'टेक्नोलॉजी पावरहाउस' के रूप में पेश किया जा रहा है। Mikael Franzen ने जोर देकर कहा कि इसमें आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) की क्षमताएं इतनी उन्नत हैं कि यह अन्य लड़ाकू विमानों से काफी आगे है। सबसे खास बात यह है कि ग्रिपेन एकमात्र ऐसा फाइटर जेट है जिसमें सॉफ्टवेयर को अपडेट करने के लिए पूरे बेड़े को लंबे समय तक ग्राउंडेड करने की जरूरत नहीं पड़ती।
भारत के लिए यह इसलिए मायने रखता है क्योंकि वायुसेना खुद अपने सॉफ्टवेयर विकसित कर सकती है और उन्हें प्रमाणित (certify) कर सकती है, वह भी बिना निर्माता कंपनी के हस्तक्षेप के। ग्रिपेन इंडिया कैंपेन के हेड Mats Palmberg ने स्पष्ट किया कि इस विमान में हथियारों का एकीकरण (weapons integration) बेहद आसान है। भारत अपनी पसंद का कोई भी हथियार इसमें तेजी से फिट कर सकता है।
भारतीय डिफेंस प्रोजेक्ट्स और AMCA पर प्रभाव
साब का यह प्रस्ताव भारत के स्वदेशी प्रोजेक्ट्स, जैसे कि AMCA (Advanced Medium Energy Combat Aircraft) के लिए एक सीढ़ी साबित हो सकता है। टेक्नोलॉजी ट्रांसफर के जरिए भारतीय इंजीनियरों को वो अनुभव मिलेगा जो भविष्य के स्वदेशी फाइटर जेट बनाने में काम आएगा। यह केवल विमानों की खरीद नहीं, बल्कि एक क्षेत्रीय इंडस्ट्रियल हब बनाने की योजना है, जिससे भविष्य में निर्यात के अवसर भी खुलेंगे।
हैरानी की बात यह है कि यह प्रस्ताव तब आया है जब खबरें हैं कि भारत फ्रांस से 114 अतिरिक्त राफेल जेट्स खरीदने के करीब है, जिसकी कीमत लगभग 3.25 लाख करोड़ रुपये ($36-38 बिलियन) हो सकती है। ऐसे में साब का यह आक्रामक रुख दिखाता है कि भारत के आसमान में कौन सा विमान राज करेगा, इसकी जंग अभी खत्म नहीं हुई है।
इतिहास और वर्तमान स्थिति
साब और भारत का रिश्ता पुराना है। ग्रिपेन ने पहले भी 'एरो इंडिया' शो में अपनी ताकत दिखाई थी, खासकर 2017 में जब तीन विमान प्रदर्शन के लिए लाए गए थे। Saab द्वारा निर्मित JAS 39 ग्रिपेन एक सिंगल-इंजन सुपरसोनिक मल्टीरोल फाइटर है। इसकी पहली उड़ान 1988 में हुई थी और 1996 में यह स्वीडिश वायुसेना में शामिल हुआ था। 2025 तक, दुनिया भर में इसके 280 से अधिक विमान डिलीवर किए जा चुके हैं।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)
ग्रिपेन E, राफेल से बेहतर विकल्प क्यों हो सकता है?
मुख्य कारण इसकी लागत और लचीलापन है। ग्रिपेन E की खरीद और संचालन लागत राफेल की तुलना में काफी कम है। साथ ही, यह राफेल (भारी हमलावर) और तेजस (हल्का फाइटर) के बीच एक रणनीतिक गैप को भरता है, जिससे वायुसेना को एक संतुलित बेड़ा मिलता है।
भारत में स्थानीय उत्पादन का क्या मतलब है?
इसका मतलब है कि विमानों का निर्माण केवल स्वीडन में नहीं, बल्कि भारत में होगा। इसमें 300 से ज्यादा भारतीय कंपनियों को शामिल किया जाएगा, जिससे भारत में नई तकनीक आएगी और रोजगार के साथ-साथ डिफेंस मैन्युफैक्चरिंग इकोसिस्टम मजबूत होगा।
क्या ग्रिपेन E भारतीय हथियारों के साथ काम करेगा?
हाँ, साब के अनुसार ग्रिपेन E की सबसे बड़ी खासियत इसकी 'वेपन इंटीग्रेशन' क्षमता है। भारत अपनी पसंद के किसी भी मिसाइल या बम को इस विमान में बहुत कम समय में इंटीग्रेट कर सकता है।
डिलीवरी कब तक शुरू हो सकती है?
प्रस्ताव के अनुसार, अनुबंध (contract) पर हस्ताक्षर होने के तीसरे वर्ष से डिलीवरी शुरू हो सकती है। शुरुआती उत्पादन स्वीडन में होगा, जो बाद में धीरे-धीरे पूरी तरह भारत में स्थानांतरित कर दिया जाएगा।